फर्जी एनकाउंटर’ पर हाईकोर्ट सख्त: 24 साल बाद न्याय की किरण, 45 दिन में मुआवजे पर फैसला जरूरी

खबर की तहतक ✍️

बिलासपुर

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने जशपुर जिले के चर्चित फर्जी एनकाउंटर मामले में सख्त रुख अपनाते हुए प्रशासन को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि पीड़ित परिवार को न्याय देने में अब और देरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। कोर्ट ने मृतक की पत्नी के मुआवजे संबंधी आवेदन पर 45 दिनों के भीतर निर्णय लेने का आदेश दिया है।

यह मामला उस कथित मुठभेड़ से जुड़ा है, जिसमें पुलिस ने एक ग्रामीण को नक्सली बताकर मार गिराया था। बाद में हुई न्यायिक जांच में यह साफ हो गया कि मृतक रामनाथ राम (नागवंशी) निर्दोष थे और उन्हें गलत तरीके से निशाना बनाया गया।

जांच में उजागर हुई सच्चाई

याचिकाकर्ता संझो बाई ने कोर्ट को बताया कि उनके पति को कांसबेल थाना पुलिस ने फर्जी एनकाउंटर में मार दिया था। पुलिस ने घटना को नक्सल विरोधी कार्रवाई बताने की कोशिश की, लेकिन जांच में यह दावा पूरी तरह झूठा साबित हुआ।

मामले की सुनवाई के बाद 11 जून 2002 को सत्र न्यायालय ने अहम फैसला सुनाते हुए—

तत्कालीन थाना प्रभारी एच.आर. अहिरवार को गैर-इरादतन हत्या (धारा 304-1) का दोषी ठहराया

पांच अन्य पुलिसकर्मियों को धारा 323/34 के तहत सजा सुनाई

मुआवजे के लिए 24 साल से संघर्ष

दोषियों को सजा मिलने के बावजूद पीड़ित परिवार को आज तक कोई मुआवजा नहीं मिल सका। मृतक की पत्नी संझो बाई ने 24 सितंबर 2024 को जशपुर कलेक्टर के समक्ष आवेदन प्रस्तुत किया, लेकिन उस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी और निर्देश

मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस नरेश कुमार चंद्रवंशी की एकल पीठ ने प्रशासनिक लापरवाही पर नाराजगी जताई और निर्देश दिए कि

कलेक्टर, जशपुर 45 दिनों के भीतर मुआवजे पर निर्णय लें

याचिकाकर्ता 15 दिनों के भीतर पुनः आवेदन और कोर्ट आदेश की प्रति प्रस्तुत कर सकती हैं

न्याय की आस जगी

हाईकोर्ट के इस सख्त रुख के बाद पीड़ित परिवार को करीब 24 वर्षों बाद न्याय मिलने की उम्मीद जगी है। यह मामला न सिर्फ प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि न्याय में देरी भले हो, लेकिन न्याय की उम्मीद खत्म नहीं होती।

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