खबर की तहतक ✍️ कोलकाता। अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (SC/ST) से जुड़े मामलों में कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और नज़ीर बनने वाला फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि SC/ST समुदाय के किसी व्यक्ति का हर अपमान अपने आप में अत्याचार नहीं माना जा सकता, जब तक कि वह SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 की अनिवार्य शर्तों को पूरा न करता हो। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति चैताली चटर्जी दास ने एक याचिका पर सुनवाई के दौरान की। क्या था मामला याचिका में आरोप लगाया गया था कि याची द्वारा SC/ST समुदाय के एक व्यक्ति के साथ अपमानजनक व्यवहार किया गया, जिसके आधार पर उसके खिलाफ SC/ST एक्ट, 1989 के तहत मामला दर्ज किया गया। याची ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर दलील दी कि आरोप सामान्य विवाद से जुड़े हैं और उन्हें जानबूझकर SC/ST एक्ट के दायरे में लाया गया है। जांच में क्या पता चला मामले की केस डायरी और उपलब्ध साक्ष्यों के अवलोकन के बाद अदालत ने पाया कि— आरोपों में जाति के आधार पर सार्वजनिक रूप से अपमान का स्पष्ट उल्लेख नहीं है यह भी प्रमाणित नहीं होता कि कथित कृत्य SC/ST समुदाय को नीचा दिखाने के उद्देश्य से किया गया प्रथम दृष्टया मामला व्यक्तिगत विवाद से जुड़ा प्रतीत होता है अदालत ने क्या कहा हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा— “यदि लगाए गए आरोपों को पूरी तरह सत्य भी मान लिया जाए, तब भी वे SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 के अंतर्गत अपराध की आवश्यक कानूनी शर्तों को पूरा नहीं करते।” अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि SC/ST समुदाय के सदस्य के साथ किया गया हर दुर्व्यवहार स्वतः ‘अत्याचार’ नहीं कहलाएगा, जब तक कि वह अधिनियम में परिभाषित तत्वों पर खरा न उतरे। फैसले का महत्व कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह निर्णय SC/ST एक्ट के दुरुपयोग पर रोक लगाने की दिशा में अहम माना जा रहा है साथ ही यह स्पष्ट करता है कि कानून का प्रयोग सोच-समझकर और तथ्यों के आधार पर ही किया जाना चाहिए Post navigation मालीपुर पुलिस ने नाबालिग अपहरण मामले में आरोपी को किया गिरफ्तार, लखनऊ से पीड़िता सकुशल बरामद बस्ती–अंबेडकर नगर को जोड़ने वाले कलवारी–टांडा मार्ग पर नए पुल की मांग, विधान परिषद में उठा मुद्दा