खबर की तहतक ✍️| नई दिल्ली। किरायेदारी और स्वामित्व को लेकर फैली भ्रांतियों पर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर स्थिति स्पष्ट कर दी है। शीर्ष अदालत ने अपने अहम फैसले में कहा है कि कोई भी व्यक्ति चाहे 50 साल या उससे अधिक समय तक किसी मकान में किराए पर क्यों न रह रहा हो, इससे उसे उस संपत्ति का मालिकाना हक प्राप्त नहीं हो जाता। सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि किरायेदारी कभी भी “Ownership” यानी स्वामित्व में परिवर्तित नहीं हो सकती। संपत्ति पर अंतिम अधिकार सदैव उसी व्यक्ति का रहेगा, जिसके नाम पर वह विधिवत दर्ज है। क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि लंबे समय तक किसी संपत्ति पर कब्जा बनाए रखना या किराए पर रहना, कानूनी रूप से मालिक बनने का आधार नहीं है। जब तक संपत्ति का वैध हस्तांतरण (रजिस्ट्री, वसीयत या कानूनी दस्तावेज) नहीं होता, तब तक किरायेदार का अधिकार केवल उपयोग तक सीमित रहता है। क्यों है यह फैसला अहम यह निर्णय उन मामलों में बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां वर्षों से रह रहे किरायेदार मालिकाना हक का दावा करते हैं या संपत्ति खाली करने से इनकार कर देते हैं। अदालत के इस स्पष्ट रुख से मकान मालिकों को कानूनी मजबूती मिलेगी और अनावश्यक भूमि विवादों पर रोक लगेगी। कानूनी विशेषज्ञों की राय विधि विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला संविधान और संपत्ति कानून के अनुरूप है। किरायेदारी एक अनुबंध आधारित संबंध होता है, जो समय के साथ स्वामित्व में नहीं बदल सकता। निष्कर्ष सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से यह पूरी तरह स्पष्ट हो गया है कि 👉 किराए पर रहना अधिकार है, लेकिन मालिक बन जाना नहीं। 👉 स्वामित्व केवल वैध दस्तावेजों से ही मिलता है, समय बिताने से नहीं। यह फैसला भविष्य में संपत्ति विवादों में मील का पत्थर साबित हो सकता है। Post navigation अंबेडकरनगर: निबियहावा पोखरा–बसखारी मार्ग से बसों का संचालन शुरू, यात्रियों को मिली बड़ी राहत मिशन शक्ति 5.0 के तहत अम्बेडकरनगर में महिला सशक्तिकरण को लेकर व्यापक जागरूकता अभियान