खबर की तहतक ✍️ ज ज ला ल जलालपुर , अंबेडकरनगर। एक तरफ सरकार स्वच्छता को जनआंदोलन बनाने का दावा कर रही है, तो दूसरी तरफ जलालपुर ब्लॉक की जमीनी हकीकत इन दावों को आईना दिखाती नजर आ रही है। गांवों की गलियों में पसरी गंदगी, बजबजाती नालियां और बीमारी का डर—यह सब उस व्यवस्था की कहानी कह रहे हैं, जहां सफाई के लिए नियुक्त कर्मचारी खुद सफाई से दूर कर दिए गए हैं। ग्रामीणों की मानें तो जिन सफाई कर्मचारियों के कंधों पर गांवों को स्वच्छ रखने की जिम्मेदारी थी, वही आज ब्लॉक कार्यालयों में फाइलें संभालते, कंप्यूटर चलाते और रजिस्टर भरते नजर आ रहे हैं। जन्म प्रमाण पत्र से लेकर परिवार रजिस्टर तक के काम उन्हीं से कराए जा रहे हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है—जब झाड़ू थामने वाले हाथों में कलम थमा दी जाएगी, तो गांव की गंदगी कौन साफ करेगा? गांवों की हकीकत बेहद संवेदनशील है। कई जगहों पर कूड़े के ढेर, बदबू और मच्छरों का प्रकोप लोगों के जीवन को प्रभावित कर रहा है। बच्चों और बुजुर्गों की सेहत पर इसका सीधा असर पड़ रहा है। यह केवल सफाई का मुद्दा नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य से जुड़ा गंभीर सवाल बन चुका है। ग्रामीणों का कहना है कि अगर किसी कर्मचारी की शारीरिक स्थिति ठीक नहीं है या वह किसी बीमारी से जूझ रहा है, तो उसे दफ्तर में अटैच करना मानवीय दृष्टिकोण से उचित हो सकता है। लेकिन जब पूरी तरह सक्षम कर्मचारी भी कार्यालयों में बैठा दिए जाएं, तो यह न सिर्फ व्यवस्था की विफलता है, बल्कि जिम्मेदारियों से खुला विचलन भी है। आरोप है कि ब्लॉक परिसर में कई सफाई कर्मचारी धीरे-धीरे “ऑफिस अटैच” होकर अपनी मूल ड्यूटी से दूर हो चुके हैं। इसका खामियाजा सीधे-सीधे ग्रामीणों को भुगतना पड़ रहा है, जो गंदगी और बीमारियों के बीच जीने को मजबूर हैं। यह स्थिति केवल एक प्रशासनिक गड़बड़ी नहीं, बल्कि संवेदनहीनता की तस्वीर भी पेश करती है। जहां जरूरत झाड़ू की है, वहां फाइलें थमाई जा रही हैं—और जहां सफाई की उम्मीद है, वहां लापरवाही पसरी हुई है। अब निगाहें प्रशासन पर टिकी हैं कि क्या वह इस गंभीर मुद्दे पर ठोस कार्रवाई करेगा और गांवों को गंदगी से मुक्ति दिलाएगा, या फिर यह असंतुलित व्यवस्था यूं ही चलती रहेगी। क्योंकि आखिरकार, स्वच्छता सिर्फ एक योजना नहीं—बल्कि हर नागरिक का अधिकार और गरिमा से जुड़ा सवाल है। वहीं, वायरल फोटो में सफाई कर्मचारियों के साथ कार्यालय में काम करते दिख रहे एडीओ पंचायत बृजेश कुमार तिवारी ने स्वीकार किया कि सफाईकर्मियों से कार्यालय के कार्य लिए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि उनसे बाबू के रूप में भी काम कराया जा सकता है। इधर, खंड विकास अधिकारी दिनेश राम ने इन आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि ब्लॉक मुख्यालय पर किसी भी सफाई कर्मचारी की कार्यालय में तैनाती नहीं है और सभी अपने-अपने निर्धारित क्षेत्रों में कार्यरत हैं। हालांकि, जब उनसे मामले में विस्तार से स्पष्टीकरण मांगा गया तो उन्होंने एडीओ पंचायत से जानकारी लेने की बात कहकर सीधा जवाब देने से परहेज किया। एक ओर अधिकारियों का खंडन, तो दूसरी ओर कर्मचारियों द्वारा स्वीकारोक्ति—ऐसे में सच्चाई क्या है, यह जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा। फिलहाल, गांवों की बदहाल सफाई व्यवस्था प्रशासन के दावों पर सवाल खड़े कर रही है। Post navigation स्कूल से घर लौट रही मासूम से दरिंदगी, नाबालिग आरोपी पुलिस के शिकंजे में शराब के लिए पैसों के विवाद में महिला की हत्या, आरोपी पति गिरफ्तार