न्याय की प्रतीक्षा में थकती उम्मीदों और खाली जेब की पीड़ा को शब्द देती कवयित्री अर्चना सिंह

खबर की तहतक | साहित्यिक प्रस्तुति

कुछ कविताएँ केवल पढ़ी नहीं जातीं, वे भीतर उतरकर सवाल बन जाती हैं। “तारीखें बस तारीखें…” ऐसी ही एक संवेदनशील रचना है, जिसमें कवयित्री अर्चना सिंह, अकबरपुर, अंबेडकर नगर ने न्याय की प्रतीक्षा में वर्षों से भटकते आम इंसान की पीड़ा, आर्थिक विवशता और टूटती उम्मीदों को शब्द देने का प्रयास किया है।

अर्चना सिंह की लेखनी में संवेदना के साथ सामाजिक सरोकार दिखाई देता है। उनकी पंक्तियाँ न्यायालय की प्रक्रिया पर कोई कानूनी निष्कर्ष प्रस्तुत करने के बजाय उस व्यक्ति की मनोदशा को सामने लाती हैं, जो हर तारीख पर उम्मीद लेकर जाता है और अगली तारीख लेकर लौटता है।

«“हर बार बड़ी उम्मीदों से

तारीख़ पर मैं जाती हूँ,

ख़ाली जेब, भरी आँखों से

फिर घर लौटकर आती हूँ।”»

इन पंक्तियों में प्रतीक्षा की वह टीस है, जहाँ उम्मीद और निराशा एक-दूसरे के सामने खड़ी दिखाई देती हैं। कविता का भाव-पक्ष विशेष रूप से उस आर्थिक वर्ग की ओर ध्यान आकर्षित करता है, जिसके लिए न्याय की प्रक्रिया से जुड़ा प्रत्येक सफर समय के साथ-साथ खर्च का बोझ भी बन सकता है।

कवयित्री ने “तारीख़ पर तारीख़ मिलती है, इंसाफ़ मगर मिल पाता नहीं” जैसे भावों के माध्यम से न्याय की प्रतीक्षा को मानवीय पीड़ा के रूप में अभिव्यक्त किया है। वहीं “काग़ज़ बढ़ते जाते हैं, फाइलें धूल में सो जाती हैं” जैसी पंक्तियाँ व्यवस्था के प्रति रचनाकार की व्यथा और प्रश्नाकुलता को साहित्यिक स्वर देती हैं।

इस रचना की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह किसी एक व्यक्ति की कहानी तक सीमित नहीं रहती, बल्कि प्रतीक्षा, विवशता, खर्च, समय और उम्मीद जैसे व्यापक मानवीय अनुभवों को स्पर्श करती है।

अर्चना सिंह की कविता में आक्रोश है, लेकिन उसके मूल में एक साधारण मनुष्य की इंसाफ पाने की आकांक्षा है। उनकी लेखनी पाठक को यह सोचने के लिए प्रेरित करती है कि न्याय केवल निर्णय का नाम नहीं, बल्कि उस निर्णय तक पहुँचने की यात्रा में जुड़े मानवीय संघर्षों को समझना भी आवश्यक है।

 

कवयित्री अर्चना सिंह : संवेदना को शब्द देने वाली लेखनी

अकबरपुर, अंबेडकर नगर की रहने वाली अर्चना सिंह हिंदी कविता एवं साहित्यिक लेखन से जुड़ी रचनाकार हैं। उनकी प्रस्तुत रचनाओं के शीर्षकों से सामाजिक जीवन, नारी मन, जिम्मेदारियों, महँगाई, सपनों, बीते समय और न्याय की प्रतीक्षा जैसे विविध मानवीय विषयों के प्रति उनकी साहित्यिक रुचि का परिचय मिलता है।

उनकी रचनात्मक दृष्टि में जीवन के साधारण अनुभव असाधारण संवेदनाओं में बदलते दिखाई देते हैं। यही साहित्य की शक्ति है—जो पीड़ा अक्सर बोल नहीं पाती, कविता उसे आवाज़ दे देती है।

“तारीखें बस तारीखें…” भी उसी आवाज़ का एक मार्मिक स्वर है।

हर बार बड़ी उम्मीदों से

तारीख़ पर मैं जाती हूँ,

ख़ाली जेब, भरी आँखों से

फिर घर लौटकर आती हूँ।

 

उलझन पहले की उतरती नहीं,

नई तारीख़ फिर आ जाती है,

उम्मीदों की लौ जलती है,

फिर निराशा छा जाती है।

 

तारीख़ पर तारीख़ मिलती है,

इंसाफ़ मगर मिल पाता नहीं,

जिस दिल में उम्मीद बची हो,

वो भी अब मुस्काता नहीं।

 

बेशर्म हुआ न्याय माँगने वाला,

पर न्यायाधीश को शर्म कहाँ आती है,

जिसके घर चूल्हा मुश्किल से जले,

उसकी पीड़ा कहाँ समझ आती है।

 

काग़ज़ बढ़ते जाते हैं,

फाइलें धूल में सो जाती हैं,

साल गुजरते जाते हैं,

उम्मीदें बूढ़ी हो जाती हैं।

 

हर तारीख़ नया खर्चा लेकर,

जेब हमारी खाली करती है,

न्याय की चौखट पर खड़ी ज़िंदगी

बस अगली तारीख़ गिनती है।

 

कब टूटेगा ये अँधियारा,

कब सवेरा आएगा?

कब सच को उसका हक़ मिलेगा,

कब न्याय नज़र आएगा?

 

बेशर्म हुआ न्याय माँगने वाला,

पर न्यायाधीश को शर्म कहाँ आती है,

तारीख़ों में उलझी ज़िंदगी,

आख़िर कब इंसाफ़ पाती है?

खबर की तहतक की साहित्यिक टिप्पणी

कविता में प्रयुक्त न्यायिक संदर्भ रचनाकार की साहित्यिक अभिव्यक्ति और भावनात्मक अनुभूति के रूप में प्रस्तुत हैं। इसे किसी न्यायालय, न्यायाधीश अथवा न्यायिक व्यवस्था के संबंध में तथ्यात्मक आरोप या निष्कर्ष के रूप में न पढ़ा जाए। कविता का उद्देश्य न्याय की प्रतीक्षा कर रहे व्यक्ति की मानवीय संवेदना और सामाजिक पीड़ा को साहित्यिक रूप में अभिव्यक्त करना है।

रचनाकार: अर्चना सिंह

स्थान: अकबरपुर, अंबेडकर नगर, उत्तर प्रदेश

विधा: हिंदी कविता

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