SC-ST राहत राशि के संभावित दुरुपयोग पर हाईकोर्ट सख्त, पूरे यूपी में जांच के निर्देश

खबर की तहतक | विशेष रिपोर्ट

प्रयागराज/झांसी।

SC-ST अधिनियम के तहत वास्तविक पीड़ितों को मिलने वाली आर्थिक राहत व्यवस्था के संभावित दुरुपयोग को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गंभीर रुख अपनाया है। न्यायमूर्ति संतोष राय की एकलपीठ ने 11 अगस्त 2026 को दिए अपने आदेश में उत्तर प्रदेश सरकार को पूरे प्रदेश में इस बात की व्यापक और गहन जांच कराने तथा प्रभावी निगरानी तंत्र विकसित करने का निर्देश दिया कि राहत राशि के दावों की जांच और भुगतान किस तरह किया जा रहा है।

यह मामला Criminal Appeal No. 10745 of 2024, Arvind Kumar and 2 Others vs. State of U.P. and 2 Others तथा संबंधित Criminal Appeal No. 10484 of 2024, Santosh Kumar Dohrey vs. State of U.P. and 2 Others से जुड़ा है। दोनों मामले झांसी की विशेष SC/ST अदालत के 23 जुलाई 2024 के आदेशों के खिलाफ हाईकोर्ट पहुंचे थे।

मामला आखिर था क्या?

पहली अपील झांसी कोतवाली में दर्ज Case Crime No. 567 of 2020 से जुड़े मामले की थी। इसमें IPC की धाराओं 170, 323, 504, 506, SC/ST Act की धाराओं 3(1)(r), 3(1)(s), 3(2)(va) तथा IT Act की धारा 67 के तहत मामला दर्ज हुआ था।

दूसरी अपील Case Crime No. 750 of 2020, थाना सिपरी बाजार, झांसी से संबंधित थी, जिसमें IPC की धाराओं 323, 504, 506, SC/ST Act की धाराओं 3(1)(r), 3(1)(s), 3(2)(va) और IT Act की धारा 67 का उल्लेख है।

इन मामलों में जांच के बाद चार्जशीट दाखिल हुई और प्रत्येक पीड़ित के लिए ₹2 लाख की राहत का प्रस्ताव भेजा गया था। नियमों के अनुसार FIR के स्तर पर 25 प्रतिशत, चार्जशीट के बाद 50 प्रतिशत और दोषसिद्धि के बाद शेष 25 प्रतिशत राहत का प्रावधान बताया गया।

₹23.36 लाख की राहत और 10-12 लंबित मामले

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से हाईकोर्ट को बताया गया कि अपीलकर्ता संतोष कुमार दोहरे, जो अधिवक्ता हैं, तथा उनके परिवार के सदस्यों को अलग-अलग आपराधिक मामलों में अब तक कुल ₹23,36,250 की राहत/आर्थिक सहायता मिल चुकी है।

सरकार की ओर से यह भी बताया गया कि लगभग 10 से 12 अन्य मामले ऐसे हैं, जो जिला स्तरीय समिति के समक्ष आगे की राहत राशि के लिए लंबित हैं।

यहीं से अदालत ने पूरे मामले को केवल एक व्यक्ति या एक मुकदमे तक सीमित न रखते हुए राहत योजना की निगरानी और संभावित दुरुपयोग के व्यापक पहलू पर विचार किया।

हाईकोर्ट ने क्या आदेश दिया?

हाईकोर्ट ने झांसी के जिलाधिकारी और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को संतोष कुमार दोहरे और उनके परिवार के सदस्यों द्वारा दर्ज कराए गए मामलों तथा उनमें प्राप्त/दावा की गई राहत राशि की तीन महीने के भीतर निष्पक्ष, समयबद्ध और विस्तृत जांच करने का निर्देश दिया।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जांच का उद्देश्य यह पता लगाना है कि कहीं SC/ST Act और संबंधित नियमों में दी गई लाभकारी व्यवस्था का दुरुपयोग तो नहीं हुआ। यदि जांच में दुरुपयोग सामने आता है तो संबंधित व्यक्तियों के साथ-साथ राहत दावों को संसाधित अथवा स्वीकृत करने वाले जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ भी कानून के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है।

पूरे उत्तर प्रदेश में बनेगा निगरानी तंत्र

मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि हाईकोर्ट ने सरकार को पूरे उत्तर प्रदेश में व्यापक और गहन जांच करने तथा प्रत्येक जिले में प्रभावी नियामक और निगरानी व्यवस्था विकसित करने को कहा है।

खास तौर पर ऐसे मामलों की निगरानी पर जोर दिया गया है, जहां एक ही व्यक्ति या उसके परिवार के सदस्यों द्वारा बार-बार राहत का दावा किया जाता है। अदालत ने यह भी जांचने को कहा कि सार्वजनिक धन जारी करने से पहले पर्याप्त सत्यापन और जांच हो रही है या नहीं।

लेकिन कोर्ट ने किसी को दोषी घोषित नहीं किया

यहां एक बेहद महत्वपूर्ण कानूनी बात समझना जरूरी है। हाईकोर्ट ने संतोष कुमार दोहरे या उनके परिवार को फर्जी मुकदमे करने का दोषी घोषित नहीं किया है।

अदालत ने अपने आदेश में साफ कहा कि जांच के आधार पर ही यह तय होगा कि योजना का दुरुपयोग हुआ या नहीं। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसके आदेश में की गई टिप्पणियों को संबंधित व्यक्तियों के मामलों या राहत पाने के अधिकार पर अंतिम फैसला नहीं माना जाएगा।

पुराना आदेश भी पलटा

हाईकोर्ट ने झांसी की विशेष अदालत द्वारा 23 जुलाई 2024 को पारित दोनों आदेशों को रद्द करते हुए मामलों को वापस विशेष न्यायाधीश के पास भेज दिया। विशेष अदालत को दोनों आवेदनों पर कानून और हाईकोर्ट की टिप्पणियों के अनुसार छह सप्ताह के भीतर नए सिरे से फैसला करने का निर्देश दिया गया।

राहत पीड़ित तक पहुंचे, लेकिन सरकारी धन की निगरानी भी हो

SC/ST Act के तहत राहत व्यवस्था का उद्देश्य वास्तविक पीड़ितों को तत्काल आर्थिक सहायता और पुनर्वास उपलब्ध कराना है। हाईकोर्ट ने भी इस उद्देश्य को स्वीकार किया है। साथ ही अदालत ने संकेत दिया कि किसी भी कल्याणकारी योजना का इस्तेमाल बार-बार आपराधिक प्रक्रिया शुरू कराकर सरकारी खजाने से आर्थिक लाभ लेने के लिए नहीं किया जा सकता।

सरकारी राहत अगर किसी पीड़ित के आंसू पोंछने के लिए है तो वह हर हाल में वास्तविक जरूरतमंद तक पहुंचनी चाहिए; लेकिन अगर कहीं व्यवस्था की कमजोरियों को तलाशकर सार्वजनिक धन निकालने का खेल होता है, तो उसकी जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।

खबर की तहतक की पड़ताल में सामने आया कि मामला “पूरे प्रदेश में फर्जी SC/ST मुकदमे साबित होने” का नहीं, बल्कि राहत राशि के संभावित दुरुपयोग की जांच और व्यवस्था को मजबूत करने के हाईकोर्ट के निर्देश का है।

डिस्क्लेमर:

यह समाचार इलाहाबाद हाईकोर्ट के 11 अगस्त 2026 के आदेश तथा उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड के आधार पर तैयार किया गया है। हाईकोर्ट ने संबंधित व्यक्तियों अथवा उनके परिवार को फर्जी मुकदमों का दोषी घोषित नहीं किया है, बल्कि राहत राशि के संभावित दुरुपयोग की स्वतंत्र जांच के निर्देश दिए हैं। ₹23,36,250 की राहत तथा लगभग 10-12 लंबित मामलों से संबंधित तथ्य सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अदालत के समक्ष रखे गए थे। किसी भी आरोप अथवा संभावित दुरुपयोग की अंतिम पुष्टि सक्षम जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही मानी जाएगी। इस समाचार का उद्देश्य किसी व्यक्ति, जाति, वर्ग या समुदाय को बदनाम करना नहीं है।

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