मारपीट और जातिसूचक शब्दों के आरोप में आरोपी को अदालत से राहत, संदेह का लाभ देते हुए किया गया बरी

खबर की तहतक न्यूज नेटवर्क

अम्बेडकरनगर।

मारपीट करने, गाली-गलौज करने तथा अनुसूचित जाति के सदस्य के साथ कथित तौर पर जातिसूचक शब्दों का प्रयोग कर अपमानित करने के मामले में आरोपी गिरीश चन्द्र पाण्डेय को विशेष न्यायालय, एससी/एसटी एक्ट, अम्बेडकर नगर ने संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया।

प्रधानाचार्य की तहरीर पर दर्ज हुई थी प्राथमिकी

प्रकरण के अनुसार, डॉ. जीके जेटली इंटर कॉलेज के तत्कालीन/प्रधानाचार्य विनय कुमार गौतम की तहरीर पर 14 फरवरी 2020 को कोतवाली अकबरपुर में गिरीश चंद्र पांडे एवं राजेश कुमार गुप्ता के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी। मामले में दोनों के खिलाफ मारपीट, गाली-गलौज तथा अनुसूचित जाति से संबंधित व्यक्ति को कथित तौर पर जातिसूचक शब्दों का प्रयोग कर अपमानित करने सहित संबंधित धाराओं में आरोप लगाए गए थे।

मुकदमे की विचारण प्रक्रिया के दौरान सह-अभियुक्त राजेश कुमार गुप्ता की मृत्यु हो गई, जिसके बाद उनके संबंध में कार्यवाही आगे नहीं बढ़ सकी। वहीं, मामले में शिक्षक गिरीश चंद्र पांडे के विरुद्ध विचारण जारी रहा।

अदालत के आदेश में कहा गया है कि अभियोजन पक्ष अपने उपलब्ध मौखिक एवं प्रलेखीय साक्ष्यों के माध्यम से घटना के दिन, समय और स्थान पर आरोपी द्वारा वादी के साथ मारपीट करने, उसे चोट पहुंचाने तथा गाली-गलौज करने के आरोप को संदेह से परे साबित करने में सफल नहीं रहा।

अदालती अभिलेख के अनुसार, बचाव पक्ष द्वारा जिरह किए जाने पर यह संभावना भी सामने आई कि कथित चोट जमीन पर गिरने के कारण भी हो सकती है। ऐसे में अभियोजन की कहानी को संदेह से परे प्रमाणित मानने के लिए पर्याप्त आधार नहीं पाया गया।

जातिसूचक शब्दों के आरोप पर भी अभियोजन नहीं कर सका ठोस प्रमाण

अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि वादी को अनुसूचित जाति का सदस्य जानते हुए जातिसूचक शब्दों का प्रयोग कर उसे अपमानित किए जाने के आरोप को भी अभियोजन पक्ष अपने साक्ष्यों से संदेह से परे साबित नहीं कर सका।

इन परिस्थितियों में न्यायालय ने आरोपी गिरीश चन्द्र पाण्डेय को भारतीय दंड संहिता की धारा 323 एवं 504 तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत लगाए गए आरोपों से दोषमुक्त किए जाने योग्य माना।

जमानत बंधपत्र निरस्त, जमानतदार दायित्व से मुक्त

अदालत के आदेश में आरोपी को उक्त आरोपों से दोषमुक्त करते हुए उसके जमानत बंधपत्र निरस्त किए जाने तथा जमानतदारों को उनके दायित्वों से उन्मोचित किए जाने का आदेश दिया गया है। साथ ही अपीलीय न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने की स्थिति के लिए धारा 437ए दण्ड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत व्यक्तिगत बंधपत्र एवं जमानत संबंधी औपचारिकता पूरी करने का निर्देश भी दिया गया।

यह आदेश 21 अगस्त 2026 को विशेष न्यायाधीश, एससी/एसटी एक्ट, अम्बेडकर नगर चिन्ता राम द्वारा पारित किया गया है।

फैसले का संदेश

अदालत का यह फैसला एक बार फिर रेखांकित करता है कि आपराधिक मुकदमे में केवल आरोप लगाए जाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि अभियोजन को आरोपों को कानूनी मानक के अनुसार संदेह से परे प्रमाणित करना होता है। जब साक्ष्यों से आरोप निर्विवाद रूप से सिद्ध नहीं हो पाते, तो कानून आरोपी को संदेह का लाभ प्रदान करता है।

डिस्क्लेमर:

यह खबर उपलब्ध कराए गए न्यायालय के आदेश/अभिलेख में दर्ज तथ्यों और निष्कर्षों के आधार पर तैयार की गई है। इसमें किसी व्यक्ति को दोषी या निर्दोष ठहराने का स्वतंत्र दावा नहीं किया गया है। न्यायालय के आदेश के अनुसार आरोपी को संबंधित आरोपों से दोषमुक्त/बरी किया गया है। किसी भी पक्ष द्वारा आदेश के विरुद्ध अपील या आगे की न्यायिक कार्यवाही की जा सकती है। पाठकों से अनुरोध है कि मामले की स्थिति के संबंध में आधिकारिक न्यायालयीन अभिलेख को ही अंतिम एवं प्रामाणिक आधार मानें।

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