चार मासूमों की मौत ने पिता को तोड़ दिया… बोले- “मेरा सब कुछ चला गया, अब जीकर क्या करूंगा?”

खबर की तहतक न्यूज नेटवर्क

कौशांबी।

कुछ दर्द ऐसे होते हैं, जिनके सामने शब्द भी खामोश पड़ जाते हैं…

कुछ बिछड़ने ऐसे होते हैं, जिनके बाद इंसान के पास आंसुओं के अलावा कुछ नहीं बचता।

कौशांबी में पटाखा फैक्ट्री में हुए भीषण विस्फोट ने एक परिवार की खुशियां पलभर में उजाड़ दीं। हादसे में एक ही परिवार के चार बच्चों की जान चली गई। पोस्टमार्टम के बाद जब मासूमों के शव घर पहुंचे, तो पूरे गांव में मातम छा गया। चीख-पुकार के बीच पिता गया प्रसाद साहू अपने बच्चों के शव देखकर खुद को संभाल नहीं सके।

बच्चों को खोने का दर्द इतना गहरा था कि बदहवास पिता के मुंह से निकला— “मेरा सब कुछ चला गया… अब जीकर क्या करूंगा।”

एक पिता के लिए इससे बड़ा दुख शायद ही कोई हो सकता है।

जिस आंगन में कभी बच्चों की आवाजें गूंजती थीं, वहां अब सन्नाटा था। जिन आंखों में बच्चों के भविष्य के सपने थे, उन्हीं आंखों के सामने चार मासूमों की अंतिम विदाई का दर्द था।

बताया गया कि बच्चों के शव घर पहुंचने के बाद पिता मुआवजे समेत अपनी मांगों को लेकर सड़क पर उतर आए। मौके पर पहुंचे सिराथू DSP सत्येंद्र तिवारी ने उन्हें गले लगाकर संभाला और भरोसा दिलाया कि प्रशासन उनके साथ है। काफी समझाने के बाद परिवार अंतिम संस्कार के लिए तैयार हुआ।

बाद में परिवार को कुल 32 लाख रुपये की सहायता राशि का चेक भी दिया गया। लेकिन सवाल यह है कि क्या कोई मुआवजा उस आंगन की हंसी वापस ला सकता है, जहां चार मासूम हमेशा के लिए खामोश हो गए?

पैसा शायद कुछ जरूरतें पूरी कर दे…

लेकिन औलाद के जाने का खालीपन शायद जिंदगी भर नहीं भरता।

यह हादसा सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि पटाखा निर्माण और सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े गंभीर सवाल भी सामने लाता है। घटना की जांच और जिम्मेदारी तय होने के बाद ही पूरे मामले की तस्वीर स्पष्ट होगी।

खबर की तहतक इस दुखद घटना में जान गंवाने वाले सभी लोगों के परिवारों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करता है।

— खबर की तहतक

खबर वही, जो सवाल भी करे और संवेदना भी समझे।

डिस्क्लेमर :

यह खबर उपलब्ध मीडिया रिपोर्टों और अन्य स्रोतो के आधार पर तैयार की गई है। घटना से जुड़े आरोप, जांच और जिम्मेदारियों पर अंतिम निष्कर्ष संबंधित जांच/प्राधिकारी की रिपोर्ट के बाद ही माना जाएगा। खबर का उद्देश्य किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि घटना और पीड़ित परिवार की स्थिति को सामने रखना है।

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