₹1.35 लाख की कथित रिश्वत लेते प्राचार्या गिरफ्तार, एंटी करप्शन टीम की ट्रैप कार्रवाई

खबर की तहतक न्यूज नेटवर्क

मेरठ।

मेरठ में भ्रष्टाचार के खिलाफ एंटी करप्शन टीम ने कार्रवाई करते हुए सहकारी डेयरी प्रशिक्षण एवं शोध संस्थान, परतापुर की प्राचार्या वंदना सिंह को 1 लाख 35 हजार रुपये की कथित रिश्वत लेते गिरफ्तार किया है। कार्रवाई सोमवार को शिकायत के आधार पर ट्रैप लगाकर की गई। मामले में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत आगे की कानूनी प्रक्रिया शुरू किए जाने की जानकारी सामने आई है।

₹3.85 लाख के बिल से जुड़ा है मामला

उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, रजपुरा निवासी ठेकेदार अमित सिवाच ने मई 2026 में संस्थान में कैंटीन और मेंटेनेंस का ठेका लिया था। उनका करीब ₹3.85 लाख का बिल जुलाई में लंबित था। आरोप है कि बिल का भुगतान कराने के लिए रिश्वत की मांग की गई।

रिपोर्ट के मुताबिक, शुरुआत में ₹1.50 लाख की मांग किए जाने का आरोप है। बाद में बातचीत के बाद ₹1.35 लाख देने की बात तय हुई और इसके बाद बिल का भुगतान किए जाने की बात सामने आई है।

शिकायत के बाद बिछाया गया ट्रैप

शिकायतकर्ता ने कथित रिश्वत मांगने की शिकायत एंटी करप्शन टीम से की। शिकायत के आधार पर टीम ने ट्रैप की कार्रवाई की तैयारी की। रिपोर्टों के अनुसार, निर्धारित रकम पर केमिकल लगाकर और नोटों के सीरियल नंबर दर्ज कर शिकायतकर्ता को रकम लेकर संस्थान भेजा गया।

आरोप है कि प्राचार्या ने अपने कार्यालय में रकम ली और उसे मेज की दराज में रख दिया। इसी दौरान एंटी करप्शन टीम ने कार्रवाई करते हुए उन्हें पकड़ लिया। बाद की प्रक्रिया में उनके हाथ धुलवाए गए, जिसमें केमिकल परीक्षण का उल्लेख रिपोर्ट में किया गया है।

कार्रवाई से संस्थान में मचा हड़कंप

एंटी करप्शन टीम की कार्रवाई के बाद संस्थान में हलचल मच गई। रिपोर्ट के अनुसार, कार्रवाई के दौरान एक अकाउंटेंट के मौके से चले जाने की बात भी सामने आई है। हालांकि, इस व्यक्ति की भूमिका को लेकर कोई अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने से पहले निकालना उचित नहीं होगा।

भ्रष्टाचार निवारण संगठन की मेरठ इकाई के अनुसार, शिकायतकर्ता ने फर्म का टेंडर जारी रखने और बिलों के भुगतान के एवज में कथित तौर पर अवैध धनराशि मांगे जाने की शिकायत की थी। इसी शिकायत के आधार पर ट्रैप कार्रवाई की गई।

सरकारी प्रक्रिया पर फिर उठा सवाल

यह कार्रवाई सरकारी संस्थानों में पारदर्शी तरीके से कामकाज और भुगतान प्रक्रिया सुनिश्चित किए जाने की जरूरत को रेखांकित करती है। यदि जांच में रिश्वत मांगने के आरोप सही साबित होते हैं तो यह न केवल संबंधित अधिकारी की जवाबदेही का मामला होगा, बल्कि सरकारी प्रक्रिया की निगरानी पर भी गंभीर सवाल खड़े करेगा।

विडंबना यह है कि जिस बिल को नियमों के मुताबिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद भुगतान होना चाहिए, उसी भुगतान के लिए कथित तौर पर अलग रकम तय होने का आरोप सामने आया। हालांकि, आरोपों की अंतिम सत्यता जांच और न्यायालय की प्रक्रिया से ही निर्धारित होगी।

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सरकारी दफ्तर में फाइल नियमों से चलनी चाहिए या कथित ‘रेट’ से—यह सवाल इस कार्रवाई के बाद एक बार फिर सामने है। एंटी करप्शन टीम की कार्रवाई निश्चित तौर पर भ्रष्टाचार के खिलाफ संदेश देती है, लेकिन व्यवस्था में स्थायी सुधार तभी माना जाएगा जब वैध काम के लिए किसी नागरिक को कथित तौर पर रिश्वत देने की जरूरत ही न पड़े।

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सवाल व्यवस्था से है, फैसला जांच और न्यायालय पर छोड़ना होगा।

डिस्क्लेमर :

यह समाचार उपलब्ध प्रकाशित रिपोर्टों और एंटी करप्शन कार्रवाई से संबंधित सूचनाओं के आधार पर तैयार किया गया है। प्राचार्या पर रिश्वत लेने का आरोप है और गिरफ्तारी हुई है, लेकिन दोषसिद्धि अभी नहीं हुई है। आरोपों की अंतिम पुष्टि जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगी। संबंधित व्यक्ति का पक्ष उपलब्ध होने पर उसे भी प्रकाशित किया जाना चाहिए।

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