खबर की तहतक न्यूज नेटवर्क अंबेडकरनगर। राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो और एंटी करप्शन टीम की कार्रवाई के बाद जिले में चर्चाओं का बाजार गर्म है। वायरल वीडियो में एक लेखपाल को कथित रूप से 10 हजार रुपये की रकम लेते हुए पकड़े जाने का दावा किया जा रहा है। कार्रवाई के बाद लेखपालों की ओर से धरना-प्रदर्शन किए जाने का वीडियो भी सामने आया है। https://khabarkitahtak.co.in/wp-content/uploads/2026/08/VID-20260823-WA0061.mp4 बस यहीं से जनता के मन में सवालों की एक नई फाइल खुल गई है—अगर कार्रवाई गलत थी तो उसका विरोध तथ्यों और कानूनी प्रक्रिया के जरिए होना चाहिए, लेकिन यदि कार्रवाई नियमानुसार हुई है तो फिर विरोध आखिर किस बात का? राजस्व विभाग में जमीन की पैमाइश, वरासत, नामांतरण और अन्य मामलों को लेकर आम लोगों को अक्सर कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। ऐसे में रिश्वत से जुड़े आरोप सामने आते हैं तो सवाल सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी व्यवस्था की पारदर्शिता पर उठता है। दस हजार रुपये या व्यवस्था का बड़ा सवाल? जनता के बीच चर्चा है कि आखिर सरकारी व्यवस्था में काम कराने के लिए कथित तौर पर पैसे देने की नौबत क्यों आती है? क्या सरकारी वेतन पर्याप्त नहीं है? क्या किसी नागरिक का काम बिना अतिरिक्त रकम के होना अब भी सामान्य बात है? और सबसे अहम—अगर कोई कर्मचारी रिश्वत के आरोप में पकड़ा जाता है तो उसके खिलाफ कानूनी प्रक्रिया का सामना होना चाहिए या उसके समर्थन में सार्वजनिक प्रदर्शन? हालांकि, किसी व्यक्ति को केवल आरोप के आधार पर दोषी मान लेना भी उचित नहीं है। यदि एंटी करप्शन कार्रवाई में कोई कानूनी या प्रक्रियात्मक त्रुटि हुई है तो उसका फैसला जांच और न्यायिक प्रक्रिया से होना चाहिए। लेकिन जनता का सवाल अपनी जगह कायम है—जिस आम आदमी का काम राजस्व कार्यालय में महीनों तक घूमता है, वह किसके पक्ष में धरना दे और किससे न्याय की उम्मीद करे? ‘उल्टा चोर कोतवाल को डांटे’ वाली कहावत क्यों याद आ रही? सोशल मीडिया पर सामने आए धरना-प्रदर्शन के बाद कुछ लोग व्यंग्य करते हुए पुरानी कहावत ‘उल्टा चोर कोतवाल को डांटे’ का उदाहरण दे रहे हैं। हालांकि, कानूनी रूप से किसी भी आरोपी को अपना पक्ष रखने और कार्रवाई को चुनौती देने का पूरा अधिकार है। असल परीक्षा यही है कि क्या विरोध तथ्यों के साथ होगा या आरोप-प्रत्यारोप के साथ? क्योंकि मामला किसी एक कर्मचारी का नहीं है। यदि कार्रवाई सही है तो भ्रष्टाचार के खिलाफ संदेश जाना चाहिए और यदि कार्रवाई गलत है तो संबंधित कर्मचारी को कानून के रास्ते से राहत मिलनी चाहिए। दोनों परिस्थितियों में निष्पक्ष जांच ही सबसे मजबूत जवाब है। धरना बढ़ा तो जनता का काम कौन करेगा? एक और चिंता राजस्व कार्यों को लेकर है। यदि विरोध-प्रदर्शन के कारण लेखपालों का काम प्रभावित होता है तो इसका सीधा असर आम नागरिकों पर पड़ सकता है। जमीन, वरासत, पैमाइश और अन्य जरूरी कार्य पहले ही लोगों के लिए संवेदनशील विषय हैं। खबर की तहतक का सवाल: दस हजार रुपये की कथित घूस से शुरू हुआ मामला अब व्यवस्था की साख तक पहुंच गया है। कार्रवाई गलत है तो कानून बताएगा, कार्रवाई सही है तो कानून अपना काम करेगा—लेकिन जनता का काम कब होगा? फिलहाल पूरे मामले में संबंधित अधिकारियों, एंटी करप्शन टीम और लेखपाल पक्ष का आधिकारिक रुख सामने आने के बाद तस्वीर और स्पष्ट होगी। डिस्क्लेमर : यह खबर सोशल मीडिया पर उपलब्ध वीडियो, सार्वजनिक चर्चाओं और उपलब्ध जानकारी पर आधारित है। किसी व्यक्ति को आरोप के आधार पर दोषी नहीं माना गया है। अंतिम निर्णय सक्षम न्यायालय की प्रक्रिया के अधीन है। Share this: Share on Facebook (Opens in new window) Facebook Share on X (Opens in new window) X Like this:Like Loading… Related Post navigation लोअर पीसीएस परीक्षार्थियों के लिए ‘सहारा’ बना नारायण फाउंडेशन, 150 से अधिक अभ्यर्थियों को मिली निःशुल्क सुविधा प्रेम के भरोसे जंगल तक पहुंची, मौत ने वहीं रोक दी राह! कपड़े उतारते ही हत्या का आरोप—सहारनपुर की वारदात से सनसनी