” साहब, मैं अभी मरा नहीं हूँ…” — जिंदा होने का सबूत देने को मजबूर बुजुर्ग, 7 साल से भटक रहा इंसाफ के लिए

 

वेब पोर्टल: खबर की तहतक ✍️

बस्ती (उत्तर प्रदेश)।

उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले से एक बेहद चौंकाने वाला और संवेदनशील मामला सामने आया है, जहां एक जीवित व्यक्ति को कागजों में मृत घोषित कर उसकी पैतृक संपत्ति पर कब्जा कर लिया गया। हैरानी की बात यह है कि पीड़ित पिछले सात वर्षों से खुद के जिंदा होने का प्रमाण देने के लिए दर-दर भटक रहा है।

मामला इशहाक अली नामक व्यक्ति का है, जिन्हें कथित रूप से एक सुनियोजित साजिश के तहत सरकारी अभिलेखों में मृत दर्ज कर दिया गया। इस कार्रवाई के बाद उनकी पैतृक जमीन पर अन्य लोगों ने कब्जा कर लिया। जबकि इशहाक अली जीवित हैं और लगातार प्रशासनिक कार्यालयों के चक्कर काट रहे हैं।

इस पूरे घटनाक्रम की तस्वीर तब और मार्मिक हो जाती है, जब इशहाक अली अपने हाथ में “मैं जिंदा हूँ” लिखी तख्ती और शरीर पर सफेद कफन ओढ़कर अधिकारियों से गुहार लगाते नजर आते हैं। यह दृश्य न केवल व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है, बल्कि न्याय प्रणाली की धीमी प्रक्रिया को भी उजागर करता है।

पीड़ित का आरोप है कि रिटायरमेंट से पहले ही उनकी जमीन हड़पने के उद्देश्य से उन्हें मृत घोषित कराया गया। उन्होंने कई बार तहसील और अन्य संबंधित विभागों में शिकायत दर्ज कराई, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी है।

कानूनी दृष्टि से यह मामला अत्यंत गंभीर है। यदि किसी जीवित व्यक्ति को जानबूझकर मृत घोषित किया गया है, तो यह कूटरचना (फर्जीवाड़ा), धोखाधड़ी और संपत्ति हड़पने जैसे गंभीर अपराधों की श्रेणी में आता है। ऐसे मामलों में संबंधित दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का प्रावधान है।

फिलहाल प्रशासन की ओर से जांच की बात कही जा रही है, लेकिन सात वर्षों से न्याय की आस लगाए बैठे इशहाक अली की हालत यह सवाल जरूर खड़ा करती है कि आखिर एक जिंदा इंसान को अपनी पहचान साबित करने में इतना लंबा संघर्ष क्यों करना पड़ रहा है?

यह घटना न केवल मानवीय संवेदनाओं को झकझोरती है, बल्कि सरकारी व्यवस्था की खामियों को भी उजागर करती है। अब देखना यह है कि प्रशासन इस मामले में कितनी तेजी और निष्पक्षता से कार्रवाई करता है।

(खबर की तहतक — सच के साथ)

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