खबर की तहतक न्यूज नेटवर्क बस्ती। सरकारी रुतबा दिखाकर सड़क पर वीआईपी अंदाज में घूमना और पुलिस-प्रशासन पर प्रभाव जमाना आखिरकार एक कथित फर्जी OSD को भारी पड़ गया। बस्ती पुलिस ने चेकिंग के दौरान एक इनोवा को रोककर जब पूछताछ की तो गाड़ी में सवार शख्स के दावों की परतें खुलती चली गईं। https://khabarkitahtak.co.in/wp-content/uploads/2026/08/VID-20260827-WA0032.mp4 पुलिस के मुताबिक, पकड़े गए व्यक्ति की पहचान मोहसिन खान के रूप में हुई है। वह खुद को सचिवालय लखनऊ का OSD बताकर कथित तौर पर रौब गांठ रहा था। उसके वाहन पर उत्तर प्रदेश सरकार का कथित फर्जी लोगो लगा था और छत पर लाल-नीली बत्ती भी लगी मिली। https://khabarkitahtak.co.in/wp-content/uploads/2026/08/VID-20260827-WA0033.mp4 बड़ेबन पुल के नीचे चेकिंग और खुल गया ‘सरकारी ओहदे’ का राज मामला बड़ेबन पुल के नीचे पुलिस चेकिंग के दौरान सामने आया। संदिग्ध इनोवा को पुलिस ने रोका तो पूछताछ में चालक और वाहन में मौजूद व्यक्ति के बारे में जानकारी ली गई। मोहसिन खान ने खुद को सचिवालय लखनऊ का OSD बताया और कथित तौर पर अपना प्रभाव दिखाने की कोशिश की। लेकिन पुलिस को उसके दावे पर संदेह हुआ। जांच आगे बढ़ी तो मामला सरकारी पद का नहीं, बल्कि सरकारी पद के नाम पर कथित रौब और सुविधाएं हासिल करने के खेल का नजर आया। गाड़ी बनी ‘चलता-फिरता VIP ऑफिस’! पुलिस के अनुसार इनोवा से कई संदिग्ध सामान बरामद हुए। इनमे – दो वॉकी-टॉकी – पांच कथित फर्जी विजिटिंग कार्ड – चार ATM कार्ड – Apple iPhone – एक की-पैड मोबाइल – 2,700 रुपये नकद शामिल हैं। यानी साहब के पास पद भले असली न निकला हो, लेकिन VIP वाला पूरा ‘सेटअप’ जरूर तैयार था। सरकारी लोगो से लेकर लाल-नीली बत्ती और विजिटिंग कार्ड तक—व्यवस्था को प्रभावित करने के लिए प्रतीकों का ऐसा इस्तेमाल किया गया कि पहली नजर में मामला सरकारी रुतबे वाला दिखाई दे। टोल से लेकर सरकारी दफ्तरों तक ‘रौब’ का कथित खेल पुलिस की पूछताछ में कथित तौर पर यह बात सामने आई कि आरोपी फर्जी अधिकारी बनकर टोल माफ कराने, सरकारी दफ्तरों में आसानी से प्रवेश करने और अधिकारियों से काम कराने का प्रयास करता था। अधिकारियों से काम कराने के नाम पर लोगों से ठगी किए जाने की बात भी पुलिस के सामने आई है। हालांकि इन आरोपों की वास्तविकता और उनसे जुड़े मामलों की पुष्टि जांच के बाद ही स्पष्ट होगी। चालक को 15 हजार रुपये महीने पर रखने का दावा पुलिस के मुताबिक, आरोपी ने वाहन चलाने के लिए एक चालक को 15 हजार रुपये मासिक वेतन पर रखा था। पूछताछ के बाद चालक को छोड़ दिया गया। यहां कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू यही है—ओहदा फर्जी, पहचान फर्जी, लेकिन नौकरी असली और तनख्वाह तय! यानी ‘साहब’ बनने की तैयारी पूरी थी, बस सरकारी कुर्सी नहीं मिली थी। गंभीर धाराओं में FIR, न्यायालय भेजने की तैयारी मामले में कोतवाली पुलिस ने आरोपी के खिलाफ संबंधित गंभीर धाराओं में FIR दर्ज कर ली है। पुलिस अब मामले की विस्तृत जांच कर रही है और आरोपी को न्यायालय के समक्ष पेश किए जाने की तैयारी है। पुलिस यह भी जांच कर सकती है कि कथित फर्जी पहचान के जरिए आरोपी ने अब तक किन-किन लोगों को प्रभावित किया, किन सरकारी कार्यालयों में प्रवेश किया और कहीं इस तरीके से किसी से आर्थिक लाभ तो नहीं लिया गया। इन पुलिसकर्मियों की टीम ने खोला फर्जी OSD का राज गिरफ्तारी एवं कार्रवाई करने वाली टीम में कोतवाल बृजानन्द सिंह, प्रभारी यातायात कुलदीप त्रिपाठी, SI जितेन्द्र सिंह, चौकी प्रभारी बड़ेबन, हेड कांस्टेबल रमाकांत यादव, कृष्णानन्द पाण्डेय, हेड कांस्टेबल अभिषेक कुमार, कांस्टेबल रितिक पाण्डेय, कुंज बिहारी और राजू यादव शामिल रहे। खबर की तहतक की नजर से सरकारी पद की असली ताकत काम करने के लिए होती है, लाल-नीली बत्ती लगाकर रौब दिखाने के लिए नहीं। लेकिन जब समाज में गाड़ी पर लोगो देखकर सलाम और लाल-नीली बत्ती देखकर रास्ता देने की आदत मजबूत हो जाए, तो कुछ लोग पद पाने के बजाय पद का नकली कवर बनाकर काम चलाने लगते हैं। बस्ती का यह मामला भी कथित तौर पर इसी मानसिकता की तस्वीर पेश करता है। फर्क बस इतना रहा कि इस बार ‘VIP’ की गाड़ी को पुलिस ने रास्ता देने के बजाय रोक लिया—और पूछताछ में पूरा ‘प्रोटोकॉल’ जमीन पर आ गया। अब असली सवाल यह है कि यदि पुलिस की नजर इस कथित फर्जी अधिकारी पर नहीं पड़ती तो यह VIP पहचान कितने दिन और कितने लोगों पर असर डालती? फिलहाल पुलिस की कार्रवाई ने एक बात साफ कर दी है—सरकारी लोगो गाड़ी पर चिपकाने से कोई सरकारी अधिकारी नहीं बन जाता और लाल-नीली बत्ती लगाने से कानून आंख बंद नहीं कर लेता। डिस्क्लेमर: यह समाचार पुलिस द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी/प्रारंभिक कार्रवाई के आधार पर तैयार किया गया है। आरोपी के विरुद्ध लगाए गए आरोपों की अंतिम पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया में साक्ष्यों के आधार पर होगी। समाचार में प्रयुक्त “कथित”, “आरोप” और “पुलिस के अनुसार” जैसे शब्द इसी कानूनी स्थिति को स्पष्ट करने के लिए इस्तेमाल किए गए हैं। आरोपी को न्यायालय द्वारा दोष सिद्ध किए जाने तक कानून की नजर में निर्दोष माना जाता है। Share this: Share on Facebook (Opens in new window) Facebook Share on X (Opens in new window) X Like this:Like Loading… Related Post navigation क्षतिग्रस्त नहर पुलिया बनी आवागमन की बाधा, कई गांवों के लोगों में आक्रोश सैदपुर बाजार की पान गुमटी का वायरल वीडियो मचा रहा हलचल, कथित गांजा बिक्री के आरोप से उठे सवाल